सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एथेनॉल सप्लाई ईयर 2025-26 के लिए एथेनॉल आवंटन व्यवस्था में फिलहाल किसी भी तरह का बदलाव नहीं करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह आदेश भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। मामले की सुनवाई जस्टिस एम.एम. सुंदरश और जस्टिस शील नागू की बेंच ने की।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E20) की राष्ट्रीय नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह एक बड़े स्तर पर लागू की गई योजना है, जिसके वास्तविक परिणाम और प्रभाव अगले वर्ष तक अधिक स्पष्ट रूप से सामने आएंगे। इसलिए मौजूदा व्यवस्था में किसी तरह का हस्तक्षेप देश की नीति और उसकी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि एथेनॉल सप्लाई से जुड़े समझौते अक्टूबर 2025 में ही पूरे किए जा चुके हैं। यदि अलग-अलग हाईकोर्ट में इसी तरह के मामलों की अलग-अलग सुनवाई जारी रही तो अलग-अलग आदेश आने की संभावना रहेगी, जिससे पूरे देश में लागू की जा रही एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से केंद्र ने ऐसे सभी मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की अनुमति भी मांगी है, ताकि एक समान फैसला हो सके।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा कि BPCL ने कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश को बड़ी बेंच के सामने चुनौती क्यों नहीं दी। इस पर सरकार ने कहा कि मामला केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे देशभर की एथेनॉल आवंटन प्रक्रिया और सरकारी नीति पर असर पड़ सकता है। इसलिए सर्वोच्च अदालत का हस्तक्षेप आवश्यक है।
अटॉर्नी जनरल ने स्पष्ट किया कि E20 नीति को वापस लेने या बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है। हालांकि, तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को कितना एथेनॉल आवंटित किया जाएगा, यह उपलब्धता, मांग और अन्य प्रशासनिक परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाता रहेगा। यानी आवंटन की मात्रा बदल सकती है, लेकिन नीति यथावत लागू रहेगी।
यह पूरा विवाद विन्प डिस्टिलरीज एंड शुगर प्राइवेट लिमिटेड की याचिका से शुरू हुआ। कंपनी ने कर्नाटक हाईकोर्ट में दावा किया था कि उसने केवल एथेनॉल उत्पादन के लिए अत्याधुनिक प्लांट स्थापित किया है, जिसकी वार्षिक क्षमता लगभग 9.90 करोड़ लीटर है। इसके बावजूद एथेनॉल सप्लाई ईयर 2025-26 के लिए उसे केवल 3.92 करोड़ लीटर की आपूर्ति का ऑर्डर मिला, जबकि उसने करीब 9.26 करोड़ लीटर की आपूर्ति के लिए बोली लगाई थी।
केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि पहले किसी कंपनी को अधिक आवंटन मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उसे हर वर्ष उसी अनुपात में एथेनॉल दिया जाए। आवंटन पूरी तरह नीति, उपलब्ध उत्पादन, कुल मांग और अन्य कंपनियों के बीच संतुलन को ध्यान में रखकर किया जाता है। यदि किसी एक कंपनी की मांग के अनुसार आवंटन किया गया तो पूरी वितरण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि पूर्व की नीति और समझौतों के आधार पर संबंधित कंपनी को पहले जैसी आपूर्ति मिलने की वैध अपेक्षा थी। इसी आधार पर अदालत ने ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को कंपनी के आवेदन पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां फिलहाल एथेनॉल आवंटन व्यवस्था में किसी भी बदलाव पर रोक लगाते हुए मौजूदा व्यवस्था को जारी रखने का निर्देश दिया गया।