जस्टिस वर्मा कैश कांड में जांच समिति का बड़ा खुलासा, तीनों आरोप सही पाए गए

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जस्टिस वर्मा कैश कांड में जांच समिति का बड़ा खुलासा, तीनों आरोप सही पाए गए

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जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कैश कांड में संसद की जांच समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को सही पाया है। समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी आवास के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में नकदी और अधजले नोट मिले थे। रिपोर्ट के मुताबिक, नकदी के स्रोत, मालिकाना हक और उसके वहां मौजूद होने की संतोषजनक वजह जस्टिस वर्मा नहीं बता सके।

जांच समिति की रिपोर्ट 12 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा में पेश की गई। यह पूरा मामला 2025 में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम में आग लगने के बाद वहां से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने से जुड़ा है। जांच के दौरान स्टोररूम में 500 रुपये के नोटों के बंडल और अधजले नोट मिलने की बात सामने आई थी।

समिति के मुताबिक, फायर सर्विस और पुलिस से जुड़े कर्मचारियों ने जांच के दौरान बताया कि नोट केवल एक जगह पर नहीं थे, बल्कि स्टोररूम के काफी हिस्से में फैले हुए थे। एक कर्मचारी ने बताया कि 500 रुपये के नोटों के बंडल स्टोररूम में कई फीट तक फैले दिखाई दिए थे। एक पुलिस अधिकारी से नकदी की संभावित मात्रा को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने भी इसे मामूली रकम से कहीं अधिक बताया।

हालांकि, इस मामले में बरामद नकदी को उस समय जब्त नहीं किया गया। नोटों की आधिकारिक गिनती भी नहीं हो सकी और न ही उनके नमूने सुरक्षित किए गए। इसी वजह से जांच समिति के लिए यह तय करना संभव नहीं था कि स्टोररूम में वास्तव में कितनी नकदी मौजूद थी। इसके बावजूद समिति ने बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी मिलने से जुड़े पहले आरोप को सही माना।

दूसरे आरोप में जांच समिति ने आग लगने के बाद सबूतों को सुरक्षित नहीं रखने और उनसे छेड़छाड़ होने की बात कही। रिपोर्ट के अनुसार, आग बुझने के बाद स्टोररूम को तुरंत सील नहीं किया गया था। रात में वहां सफाई किए जाने की बात भी जांच के दौरान सामने आई। सुबह तक जला हुआ सामान बाहर निकाल दिया गया और कमरे की सफाई कर दी गई।

समिति ने माना कि इस प्रक्रिया के दौरान वहां मौजूद महत्वपूर्ण सबूत सुरक्षित नहीं रखे गए। खास तौर पर जले और अधजले नोटों को सुरक्षित नहीं किया गया और बाद में उनका पता भी नहीं चल पाया। जांच समिति के अनुसार, इस तरह सबूतों को सुरक्षित रखने में गंभीर कमी रही और इससे जांच की प्रक्रिया प्रभावित हुई। इसी आधार पर दूसरा आरोप भी साबित माना गया।

तीसरे आरोप का संबंध जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए जवाबों से था। शुरुआत में उन्होंने नकदी के बारे में जानकारी होने से इनकार किया था। बाद में बचाव में नकदी के नकली होने और इसे साजिश के तहत वहां रखे जाने जैसी बातें सामने आईं। लेकिन जांच समिति के सामने इन दावों के समर्थन में कोई ठोस शिकायत, प्राथमिकी या अन्य पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए गए।

समिति ने यह भी कहा कि जस्टिस वर्मा ने खुद गवाही नहीं दी और अपने परिवार या स्टाफ के किसी सदस्य को भी गवाह के रूप में पेश नहीं किया। रिपोर्ट में उनके स्पष्टीकरण को अधूरा, टालमटोल वाला और भ्रामक प्रभाव पैदा करने वाला बताया गया। इसी आधार पर जांच समिति ने तीसरे आरोप को भी सही माना।

रिपोर्ट सामने आने के बाद अब इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार या आपराधिक मामले में प्राथमिकी दर्ज करने पर अपने आप कोई संवैधानिक रोक नहीं होती। इस मामले में नकदी के जलने, बचे हुए नोटों के गायब होने और शुरुआती जांच में जरूरी प्रक्रिया नहीं अपनाए जाने को लेकर भी सवाल उठे हैं।

जस्टिस यशवंत वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने अपने इस्तीफे में कहा था कि इस पद पर सेवा करना उनके लिए सम्मान की बात रही है और उन्होंने तत्काल प्रभाव से पद छोड़ने का निर्णय लिया। अब जांच समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों और आगे की संभावित कार्रवाई को लेकर मामला फिर चर्चा में है।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि सरकारी आवास के स्टोररूम में इतनी बड़ी मात्रा में नकदी आखिर कहां से आई और उसका वास्तविक स्रोत क्या था। जांच समिति के अनुसार, इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाया। साथ ही, आग के बाद मौके पर मौजूद सबूतों को सुरक्षित नहीं रखे जाने के कारण नकदी की वास्तविक मात्रा और उसके स्रोत से जुड़े कई सवाल अब भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सके हैं।