छात्र आंदोलनों पर पुलिस बल प्रयोग के आरोपों की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, कई राज्यों की घटनाएं अदालत के दायरे में

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सुप्रीम कोर्ट में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कथित पुलिस अत्याचार और जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हो गई है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच इन मामलों पर विचार कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि याचिकाओं में पुलिस कार्रवाई को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनकी न्यायिक जांच जरूरी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण विरोध को स्वतः पुलिस कार्रवाई का आधार नहीं माना जा सकता।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि मामला केवल राजधानी दिल्ली तक सीमित नहीं है। उन्होंने अदालत को बताया कि मध्य प्रदेश, नागपुर, बिहार और अन्य राज्यों में भी छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर शिकायतें सामने आई हैं। उनके अनुसार अलग-अलग राज्यों में हुई घटनाओं का स्वरूप भले अलग हो, लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि क्या विरोध प्रदर्शन के दौरान संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर पुलिस ने बल प्रयोग किया या नहीं।

चीफ जस्टिस ने याचिकाओं में लगाए गए आरोपों का उल्लेख करते हुए कहा कि एक 19 वर्षीय छात्र की आंख में पैलेट लगने से उसकी दृष्टि प्रभावित होने का दावा किया गया है। अदालत के समक्ष यह भी कहा गया कि कुछ मामलों में इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल के आरोप लगाए गए हैं। एक युवती के गंभीर रूप से घायल होकर ICU में भर्ती होने और कीलों वाली लाठियों से हमला किए जाने जैसे आरोप भी रिकॉर्ड पर लाए गए हैं। अदालत ने कहा कि इन आरोपों की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि कुछ पुलिसकर्मियों ने सादे कपड़ों में प्रदर्शनकारियों के बीच जाकर कार्रवाई की। एक पत्रकार के साथ कथित रूप से मारपीट किए जाने का आरोप भी अदालत के सामने रखा गया। इसके अतिरिक्त बिना किसी उकसावे के एक महिला प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मारने और आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग करने संबंधी अलग शिकायतों का भी उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि यदि ऐसे आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाते हैं तो यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि नागरिक अधिकारों का भी मामला बनता है।

इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद तक निकाले गए छात्र मार्च का उल्लेख किया गया। प्रदर्शन के दौरान कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ था। कुछ समूहों ने बैरिकेड पार करने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए बल प्रयोग किया। आंसू गैस के गोले छोड़े गए और बाद में पथराव की घटनाएं भी सामने आईं। इस पूरे घटनाक्रम में पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों दोनों के घायल होने की जानकारी दी गई थी।

अदालत में यह तर्क भी रखा गया कि विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है और राज्य का दायित्व केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना भी है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यदि भीड़ में कुछ लोग हिंसक हो जाते हैं तो पूरी भीड़ के खिलाफ अंधाधुंध बल प्रयोग को उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने मांग की कि पुलिस कार्रवाई के मानकों, बल प्रयोग की सीमा और जवाबदेही की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह संकेत दिया कि वह मामले को केवल राजनीतिक विवाद के रूप में नहीं देख रही है। बेंच ने कहा कि प्रश्न यह है कि क्या कानून लागू करने वाली एजेंसियों ने परिस्थितियों के अनुरूप, अनुपातिक और वैधानिक तरीके से कार्रवाई की। अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन इसके साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण एकत्र होने के अधिकार का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

याचिकाओं में विभिन्न राज्यों को पक्षकार बनाए जाने की जानकारी भी दी गई। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अलग-अलग घटनाओं में समान प्रकार के आरोप सामने आए हैं, इसलिए व्यापक दिशा-निर्देशों की आवश्यकता हो सकती है। अदालत ने मामले को सुनवाई योग्य मानते हुए रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का परीक्षण शुरू किया है। इससे पहले इन घटनाओं को लेकर अलग-अलग स्तर पर कई कानूनी प्रयास किए जा चुके थे, लेकिन वर्तमान सुनवाई में पहली बार विस्तृत आरोपों को एक साथ रखा गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल किसी आरोप की सत्यता पर अंतिम टिप्पणी नहीं की है। बेंच ने कहा कि सभी पक्षों को सुनने के बाद ही कोई निष्कर्ष निकाला जाएगा। अदालत ने संकेत दिया कि वह पुलिस कार्रवाई, बल प्रयोग के तरीके, घायलों की स्थिति और उपलब्ध रिकॉर्ड सहित सभी पहलुओं की जांच करेगी। मामले की अगली सुनवाई में संबंधित राज्यों और अन्य पक्षों से जवाब मांगे जाने की संभावना है।

यह सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इसका प्रभाव केवल एक प्रदर्शन या एक राज्य तक सीमित नहीं रह सकता। यदि अदालत इस मामले में कोई व्यापक सिद्धांत या दिशा-निर्देश तय करती है, तो भविष्य में छात्र आंदोलनों, सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों में उसका असर देखा जा सकता है। फिलहाल देशभर की नजरें सुप्रीम कोर्ट की इस कार्यवाही पर टिकी हैं, जहां लोकतांत्रिक अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण बहस जारी है।