रिजिजू का राहुल गांधी पर पलटवार- महिला मुद्दे पर बोले: हर समुदाय की महिलाओं की बात हो, समाज को बांटने से बचें

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केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने महिलाओं की आजादी और पितृसत्ता को लेकर राहुल गांधी के हालिया बयान पर सवाल उठाए हैं। रिजिजू ने कहा कि महिलाओं के अधिकार और सम्मान की बात सभी समुदायों की महिलाओं को ध्यान में रखकर होनी चाहिए।

रिजिजू ने सवाल किया कि अगर महिलाओं के अधिकारों को लेकर सामाजिक सुधार की बात की जा रही है, तो उसमें अलग-अलग समुदायों की महिलाओं के मुद्दों को भी समान रूप से शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कांग्रेस के रुख को लेकर भी सवाल उठाए।

रिजिजू की यह प्रतिक्रिया राहुल गांधी के उस बयान के बाद सामने आई, जिसमें उन्होंने महिलाओं की स्वतंत्र पहचान और पितृसत्ता को खत्म करने की जरूरत पर बात की थी। राहुल ने महिलाओं को अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने की आजादी देने पर जोर दिया था।

राहुल गांधी ने महिलाओं की पहचान को पिता, पति या बेटे से जोड़ने वाली सोच की आलोचना की थी। उनका कहना था कि महिलाओं की अपनी स्वतंत्र पहचान होनी चाहिए और उन्हें किसी दूसरे व्यक्ति पर अपनी पहचान के लिए निर्भर नहीं रहना चाहिए।

राहुल ने महिलाओं के सामने आने वाली कई सामाजिक चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, संपत्ति और अपने फैसले लेने के अधिकार में बराबरी मिलनी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि कई लड़कियों की पढ़ाई शादी और घरेलू जिम्मेदारियों के कारण प्रभावित होती है। राहुल ने महिलाओं को शिक्षा और रोजगार के अवसरों से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया।

राहुल गांधी ने छात्राओं से अपनी बात खुलकर रखने और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि महिलाओं को डर या सामाजिक दबाव के कारण अपनी इच्छाओं और क्षमताओं को सीमित नहीं करना चाहिए।

इस दौरान राहुल ने पितृसत्ता की उस व्यवस्था पर भी सवाल उठाए, जिसमें महिलाओं के जीवन और फैसलों पर परिवार या समाज का नियंत्रण रहता है। उन्होंने महिलाओं को अपने फैसले खुद लेने की आजादी देने की बात कही।

दूसरी ओर, रिजिजू ने राहुल गांधी के बयान के संदर्भ में कहा कि महिलाओं के अधिकारों की चर्चा को किसी एक समुदाय या परंपरा तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनका जोर इस बात पर था कि महिला अधिकारों का मुद्दा सभी महिलाओं के लिए समान रूप से उठाया जाना चाहिए।

महिलाओं की स्वतंत्रता, शिक्षा, रोजगार और सम्मान को लेकर यह राजनीतिक बहस अब दो अलग-अलग दृष्टिकोणों के बीच दिखाई दे रही है। एक तरफ महिलाओं को सामाजिक बंधनों से मुक्त करने की बात है, वहीं दूसरी तरफ इस मुद्दे को सभी समुदायों के संदर्भ में समान रूप से देखने की मांग उठ रही है।